कहते हैं कि अगर हौसले बुलंद हों, तो बड़ी से बड़ी मुश्किल भी इंसान का रास्ता नहीं रोक सकती। भारतीय पैरा एथलीट निषाद कुमार की कहानी इस बात का जीता-जागता उदाहरण है। महज छह साल की उम्र में एक दर्दनाक हादसे में अपना दायां हाथ गंवाने वाले निषाद ने कभी अपनी परिस्थितियों को सपनों के बीच दीवार नहीं बनने दिया। आज वही निषाद अंतरराष्ट्रीय खेलों में भारत का नाम रोशन कर रहे हैं और लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। हाल ही में एशियाई पैरा खेल 2026 में उनके शानदार प्रदर्शन ने एक बार फिर उनकी मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति को चर्चा में ला दिया है।
हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले के बदाऊं गांव में जन्मे निषाद कुमार का बचपन सामान्य बच्चों की तरह बीत रहा था। लेकिन छह साल की उम्र में उनके साथ ऐसा हादसा हुआ, जिसने उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। घर के खेत में चारा काटने वाली मशीन की चपेट में आने से उनका दायां हाथ बुरी तरह घायल हो गया और आखिरकार उसे काटना पड़ा। इस घटना ने उनके परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया। उनके पिता खेती के साथ मजदूरी और राजमिस्त्री का काम करके परिवार का पालन-पोषण करते थे। ऐसे कठिन दौर में परिवार के लिए इस हादसे से उबरना आसान नहीं था
इस मुश्किल परिस्थिति के बावजूद निषाद ने हार नहीं मानी। उनकी मां पुष्पा देवी राज्य स्तर की वॉलीबॉल खिलाड़ी और डिस्कस थ्रोअर रह चुकी थीं। खेलों से मां का जुड़ाव निषाद के लिए प्रेरणा बना। उन्होंने खेल के मैदान में अपनी पहचान बनाने का फैसला किया और धीरे-धीरे एथलेटिक्स की ओर कदम बढ़ाए। शुरुआत में उन्होंने दौड़ और अन्य स्पर्धाओं में भाग लिया, लेकिन आगे चलकर ऊंची कूद उनकी प्रमुख पहचान बन गई। स्कूल के कोच रमेश ने भी उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। लगातार अभ्यास, अनुशासन और मेहनत के दम पर निषाद ने अपनी कमजोरियों को ताकत में बदल दिया।















