भारत ने कहा है कि यूनाइटेड नेशंस अपनी पहचान खो रहा है क्योंकि आठ दशक पहले लड़े गए युद्ध का नतीजा UN सिक्योरिटी काउंसिल की बनावट को बना रहा है। भारत ने काउंसिल को आज की दुनिया की सच्चाइयों को दिखाने वाला और ज़्यादा रिप्रेजेंटेटिव बनाने के लिए सुधारों की मांग की है।
कल UN जनरल असेंबली में बोलते हुए, यूनाइटेड नेशंस में भारत के परमानेंट रिप्रेजेंटेटिव, पी. हरीश ने कहा कि 80 साल पहले लड़े गए किसी भी युद्ध से आज का वर्ल्ड ऑर्डर तय नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि दूसरे वर्ल्ड वॉर में जीत से मिला अधिकार, बिना किसी रिप्रेजेंटेटिव वाली सिक्योरिटी काउंसिल से पैदा होने वाली लेजिटिमेसी की कमी की भरपाई नहीं कर सकता।भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधारों की मांग करते हुए कहा है कि यदि विश्व संस्था मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों और देशों की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करती, तो वह अपनी प्रासंगिकता और पहचान खोने का जोखिम उठाती है। भारत ने स्पष्ट किया कि करीब आठ दशक पहले लड़े गए द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामों के आधार पर आज की दुनिया की व्यवस्था तय नहीं की जा सकती। संयुक्त राष्ट्र महासभा में गुरुवार को संबोधित करते हुए संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने कहा कि सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना आज के वैश्विक शक्ति संतुलन और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की विविधता को पर्याप्त रूप से प्रदर्शित नहीं करती है। उन्होंने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध में मिली जीत के आधार पर कुछ देशों को प्राप्त विशेष अधिकार, सुरक्षा परिषद में पर्याप्त प्रतिनिधित्व की कमी से उत्पन्न वैधता के संकट की भरपाई नहीं कर सकते। भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद में सुधारों की वकालत करता रहा है और उसका मानना है कि परिषद को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, पारदर्शी और प्रभावी बनाया जाना चाहिए। भारत के अनुसार, एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका सहित दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों को वैश्विक निर्णय लेने की प्रक्रिया में उचित स्थान मिलना चाहिए। मौजूदा व्यवस्था में सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस हैं, जिन्हें वीटो का विशेष अधिकार प्राप्त है। इसके अलावा, दस अस्थायी सदस्य दो वर्ष के कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं। भारत का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था उस समय की वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप बनाई गई थी, लेकिन आज दुनिया की राजनीतिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय वास्तविकताएं काफी बदल चुकी हैं। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र को भी बदलती परिस्थितियों के अनुसार अपनी संरचना में सुधार करना चाहिए। भारत ने इस बात पर जोर दिया कि सुरक्षा परिषद की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए विकासशील देशों और कम प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्रों की भागीदारी बढ़ाना आवश्यक है। सुधारों की मांग केवल परिषद में सदस्यों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय फैसलों को अधिक समावेशी और स्वीकार्य बनाना भी है। भारत सहित कई देश लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विस्तार और कार्यप्रणाली में बदलाव की मांग कर रहे हैं। भारत का मानना है कि प्रभावी सुधारों से वैश्विक चुनौतियों, अंतरराष्ट्रीय संघर्षों और सुरक्षा संबंधी मुद्दों से निपटने में संयुक्त राष्ट्र की क्षमता मजबूत हो सकती है। पी. हरीश के बयान ने एक बार फिर इस बहस को सामने ला दिया है कि क्या आठ दशक पुरानी व्यवस्था आज की बहुध्रुवीय दुनिया की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है।














