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पीयूष गोयल ने विकसित देशों को 100 अरब डॉलर की क्लाइमेट फाइनेंस प्रतिबद्धता की दिलाई याद, कहा- “इसका एक पैसा भी नहीं मिला


देश 23 October 2026
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पीयूष गोयल ने विकसित देशों को 100 अरब डॉलर की क्लाइमेट फाइनेंस प्रतिबद्धता की दिलाई याद, कहा- “इसका एक पैसा भी नहीं मिला

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जलवायु परिवर्तन की जिम्मेदारी को लेकर विकसित देशों के रिकॉर्ड पर सवाल खड़े किए हैं। बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में एक राउंडटेबल को संबोधित करते हुए उन्होंने अमीर देशों और यूरोपीय संघ पर आरोप लगाया कि वे ग्लोबल साउथ के लिए की गई जलवायु वित्त की प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में पूरी तरह विफल रहे हैं।

पीयूष गोयल ने कहा कि ऐतिहासिक रूप से वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में सबसे बड़ा हिस्सा इन्हीं विकसित देशों का रहा है। फिर भी वे पेरिस समझौते के तहत विकासशील और कमजोर देशों को वित्तीय व तकनीकी मदद देने के अपने वादे से पीछे हट रहे हैं। 

उन्होंने याद दिलाया, “2015 के पेरिस जलवायु सम्मेलन में जब पूरी दुनिया एक साथ आई थी, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लोबल साउथ को एकजुट किया और देशों को COP21 में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए प्रतिबद्ध होने के लिए प्रेरित किया। उस समय सहमति बनी थी कि विकसित देश—जिन्होंने दशकों तक जलवायु को नुकसान पहुंचाकर फायदा उठाया है—इसकी बड़ी कीमत चुकाएंगे। वे विकासशील, कम विकसित देशों और प्रशांत व कैरेबियन क्षेत्रों के द्वीपीय देशों की मदद करेंगे… बस 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष। यही प्रतिबद्धता थी।”

11 साल बाद भी वादा अधूरा; CBAM पर भी सवाल

लंबे समय से कोई ठोस कदम न उठाए जाने पर नाराजगी जताते हुए गोयल ने कहा, “ग्यारह साल बीत जाने के बाद भी हमें इसका एक पैसा भी नहीं मिला है। ये सब सिर्फ वादे हैं। यह एक बड़ा सवाल है जिसका जवाब यूरोपीय संघ और CBAM (कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म) देने में विफल रहे हैं।”

वाणिज्य मंत्री उन वित्तीय वादों का जिक्र कर रहे थे जो विकसित देशों ने पहले के जलवायु सम्मेलनों में किए थे। 2009 में कोपेनहेगन (COP15) में विकसित देशों ने 2020 तक हर साल 100 अरब अमेरिकी डॉलर जुटाने का वादा किया था। जब वे इसे पूरा नहीं कर पाए, तो 2015 के पेरिस सम्मेलन (COP21) में इस लक्ष्य को 2025 तक बढ़ा दिया गया। 

गोयल ने आगे कहा, “वे कम विकसित देशों की जरूरतों को पूरा करने या उनके डीकार्बोनाइजेशन प्रयासों में मदद करने में भी विफल रहे हैं।”

जनसंख्या और उत्सर्जन का बड़ा असंतुलन; भारत का प्रति व्यक्ति फुटप्रिंट बहुत कम

पीयूष गोयल ने पश्चिमी देशों और भारत के बीच जनसंख्या आकार तथा कार्बन उत्सर्जन में मौजूद भारी अंतर को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा, “आखिर इस गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार कौन है? ओजोन परत को नुकसान कहां पहुंचा? वायुमंडल में इतना सारा कार्बन किसने भेजा? मैं दुनिया की 17 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करता हूं, लेकिन वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में मेरा योगदान 3 प्रतिशत से भी कम है। आप (यूरोप) शायद दुनिया की 3-4 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं, फिर भी कार्बन उत्सर्जन—यानी इस समस्या—में आपका योगदान बहुत बड़ा है। यह समस्या आपके कारण पैदा हुई है।”

उन्होंने जोर दिया कि भारत में प्रति व्यक्ति कार्बन फुटप्रिंट यूरोप की तुलना में बहुत कम है। “आज भी कार्बन उत्सर्जन में मेरा प्रति व्यक्ति योगदान शायद आपके योगदान का 10-15 प्रतिशत से भी कम है। यूरोप का प्रति व्यक्ति प्रभाव भारत की तुलना में शायद सात-आठ गुना अधिक है। मैं दुनिया की 17 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करता हूं और कचरे तथा सर्कुलर इकोनॉमी को लेकर कहीं अधिक जागरूक हूं।”

विकास की जरूरतों के साथ स्वच्छ ऊर्जा में तेज प्रगति

भारत की तेजी से हो रही हरित ऊर्जा की ओर शिफ्ट और देश की विकास आवश्यकताओं का जिक्र करते हुए पीयूष गोयल ने कहा, “मुझे 1.4 अरब लोगों की जरूरतों को भी पूरा करना है। मुझे उनकी ऊर्जा और भोजन संबंधी जरूरतों को पूरा करना है और यह सुनिश्चित करना है कि मेरा देश सुरक्षित रहे। इन सबके बावजूद हमारे पास दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते स्वच्छ ऊर्जा कार्यक्रमों में से एक है।” 

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