रांची, 25 अप्रैल । महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध, विशेषकर झारखंड में डायन प्रथा (विच हंटिंग) जैसी गंभीर सामाजिक समस्या पर शनिवार को एक महत्वपूर्ण वार्तालाप कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम झारखंड न्यायिक अकादमी के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ऑडिटोरियम में आयोजित हुआ, जिसमें अपराध पीड़ितों को राहत और पुनर्वास प्रदान करने में विधिक सेवा संस्थाओं की भूमिका पर भी विस्तार से चर्चा की गई।
इस अवसर पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश एवं राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (एनएएलएसए) के कार्यकारी अध्यक्ष न्यायमूर्ति विक्रम नाथ मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। वहीं न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमनुल्लाह विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए।
कार्यक्रम में झारखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति महेश शरदचंद्र सोनाक, न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद सहित कई गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति रही।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने अपने संबोधन में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 महिलाओं को समानता, भेदभाव से मुक्ति और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देते हैं, लेकिन वास्तविकता में इन अधिकारों और उनके क्रियान्वयन के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराध समाज की गहरी संरचनात्मक समस्या का परिणाम हैं, जहां हिंसा को सामान्य मान लिया गया है। विशेष रूप से झारखंड में प्रचलित डायन प्रथा को उन्होंने अमानवीय और लैंगिक हिंसा का गंभीर रूप बताया।
उन्होंने कहा कि डायन प्रथा केवल अंधविश्वास नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता, सत्ता संघर्ष और पितृसत्ता से जुड़ा मुद्दा है। इस पर प्रभावी रोक लगाने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और सामाजिक संवेदनशीलता अत्यंत आवश्यक हैं।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने यह भी कहा कि न्याय केवल अपराधियों को सजा देने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि पीड़ितों के पुनर्वास को इसका केंद्र बनाया जाना चाहिए। विधिक सेवा संस्थाओं को गांव स्तर तक पहुंच बनाकर पीड़ितों को कानूनी सहायता, जागरूकता और मुआवजा दिलाने में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
मौके पर न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने मॉब लिंचिंग के मुद्दे पर कहा कि उच्चतम न्यायालय ने कई बार दिशा-निर्देश जारी किए हैं। यदि इन दिशा-निर्देशों और कानूनों का सही ढंग से पालन हो तथा जिला स्तर पर कानूनी निकाय सक्रिय रूप से कार्य करे, तो ऐसी घटनाओं में कमी लाई जा सकती है।
उन्होंने कहा कि किसी भी संस्थान की जिम्मेदारी निष्पक्ष होकर कार्य करना है। न्यायिक व्यवस्था की भूमिका लंबित मामलों के शीघ्र निष्पादन में महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी कहा कि “फायर फाइटिंग” की धारणा को बदलना होगा और सही व्यक्ति को सही स्थान पर बैठाने से मामलों के निष्पादन में तेजी लाई जा सकती है।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र का धन्यवाद ज्ञापन महिला, बाल विकास एवं समाज कल्याण विभाग के सचिव उमाशंकर सिंह ने किया। वहीं द्वितीय सत्र में कानूनी और तकनीकी विषयों पर विशेषज्ञों ने अपने विचार और सुझाव साझा किए।
कार्यक्रम के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत स्वयंसेवी संस्थाओं की महिलाओं, दुर्घटना पीड़ित परिवारों तथा ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित महिलाओं को आर्थिक सहायता भी प्रदान की गई।
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महिलाओं के खिलाफ अपराध समाज में मौजूद एक गहरी संरचनात्मक समस्या का परिणाम : न्यायमूर्ति विक्रम नाथ




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