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विश्व समुद्री दिवस : समुद्र की सेहत से जुड़ा है पृथ्वी और मानवता का भविष्य


देश 24 September 2026
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विश्व समुद्री दिवस : समुद्र की सेहत से जुड़ा है पृथ्वी और मानवता का भविष्य

धरती का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा समुद्र से ढका हुआ है और मानव सभ्यता का विकास भी समुद्र से गहरे रूप से जुड़ा रहा है। समुद्र ने महाद्वीपों को जोड़ा, व्यापार के मार्ग खोले, सभ्यताओं के बीच संवाद बढ़ाया और करोड़ों लोगों को आजीविका प्रदान की। आज भी वैश्विक अर्थव्यवस्था में समुद्री परिवहन की महत्वपूर्ण भूमिका है। भोजन, ऊर्जा, कच्चे माल और तैयार उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही में समुद्री मार्गों का व्यापक योगदान है। किसी बड़े समुद्री संकट का असर वैश्विक बाजारों और आम उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है। समुद्री जलवायु, जैव विविधता, अर्थव्यवस्था और मानव संस्कृति के लिए भी महत्वपूर्ण है। इसी व्यापक महत्व तथा समुद्री परिवहन की सुरक्षा, दक्षता और पर्यावरणीय स्थिरता के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से हर वर्ष सितंबर के अंतिम गुरुवार को विश्व समुद्री दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2026 और 2027 के लिए अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) ने “From Policy to Practice: Powering Maritime Excellence” को विषय बनाया है। इसका संदेश है कि समुद्री क्षेत्र से जुड़े अंतरराष्ट्रीय नियम और नीतियां केवल दस्तावेजों तक सीमित न रहें, बल्कि जहाजों, बंदरगाहों, समुद्री श्रमिकों और तटीय क्षेत्रों में प्रभावी रूप से लागू हों। आज जलवायु परिवर्तन, समुद्री प्रदूषण, प्लास्टिक कचरा, जैव विविधता का क्षरण, अत्यधिक मत्स्य दोहन और भू-राजनीतिक तनाव जैसी चुनौतियां समुद्री व्यवस्था को प्रभावित कर रही हैं। इसलिए विश्व समुद्री दिवस समुद्र और मानव जीवन के परस्पर संबंध तथा उसके संरक्षण की साझा जिम्मेदारी को समझने का अवसर है।

समुद्र : वैश्विक अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा

समुद्री परिवहन आधुनिक वैश्विक व्यापार की आधारभूत संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में उत्पादित वस्तुओं को बाजारों तक पहुंचाने के लिए विशाल जहाजों, कंटेनर टर्मिनलों, बंदरगाहों, समुद्री मार्गों और लॉजिस्टिक नेटवर्क का एक जटिल तंत्र काम करता है। समुद्री परिवहन की क्षमता और व्यापकता ने देशों के बीच व्यापार को गति देने के साथ उत्पादन और उपभोग के वैश्विक स्वरूप को भी बदल दिया है। किसी बंदरगाह पर जहाज के पहुंचने के पीछे केवल समुद्री यात्रा नहीं होती, बल्कि उसके साथ हजारों श्रमिकों, पोर्ट ऑपरेटरों, सीमा शुल्क अधिकारियों, लॉजिस्टिक कंपनियों, जहाज प्रबंधकों, पायलटों, इंजीनियरों और अन्य पेशेवरों का समन्वित प्रयास जुड़ा होता है। यही कारण है कि समुद्री क्षेत्र को केवल परिवहन उद्योग के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह कृषि, विनिर्माण, ऊर्जा, खनन, मत्स्य पालन और उपभोक्ता बाजारों से सीधे जुड़ा हुआ व्यापक आर्थिक तंत्र है। समुद्री व्यापार की निर्बाध गति के लिए सुरक्षित नौवहन, आधुनिक बंदरगाह, कुशल मानव संसाधन और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन आवश्यक है। किसी समुद्री मार्ग में बाधा आने पर उसके प्रभाव की श्रृंखला बहुत दूर तक पहुंच सकती है। इसलिए समुद्री परिवहन की स्थिरता वैश्विक आर्थिक स्थिरता का भी महत्वपूर्ण आधार है।

2026 की थीम : नीति से व्यवहार तक की यात्रा

विश्व समुद्री दिवस 2026 की थीम समुद्री शासन के एक महत्वपूर्ण पक्ष की ओर ध्यान आकर्षित करती है। नीतियों का प्रभावी क्रियान्वयन। पिछले कई दशकों में IMO ने समुद्री सुरक्षा, प्रदूषण नियंत्रण, जहाजों की संरचना, नाविकों के प्रशिक्षण और समुद्री परिवहन से जुड़े अनेक अंतरराष्ट्रीय नियम विकसित किए हैं। लेकिन किसी नियम की वास्तविक सफलता तभी मानी जा सकती है जब वह जहाज के डेक, बंदरगाह और समुद्री प्रशासन के दैनिक कामकाज में दिखाई दे। IMO के अनुसार उसके पास लगभग आठ दशकों में विकसित व्यापक अंतरराष्ट्रीय नियामक ढांचा है, लेकिन इन नियमों का पूरा लाभ तभी प्राप्त हो सकता है जब उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार करने के साथ प्रभावी ढंग से लागू और लागू करवाया जाए। संगठन ने इसी कारण 2026-27 की थीम में तकनीकी सहयोग, प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और ज्ञान-साझेदारी पर जोर दिया है। इस दृष्टि से समुद्री उत्कृष्टता का अर्थ केवल तेज जहाज या आधुनिक बंदरगाह नहीं है। सुरक्षित जहाज, प्रशिक्षित नाविक, सक्षम निरीक्षण व्यवस्था, पर्यावरणीय मानकों का पालन, कुशल बंदरगाह और जिम्मेदार प्रशासन इन सभी का सम्मिलित परिणाम ही वास्तविक समुद्री उत्कृष्टता है।

भारत की प्राचीन समुद्री परंपरा

भारत का समुद्र से संबंध आधुनिक काल का नहीं है। भारतीय उपमहाद्वीप की सभ्यता में समुद्री व्यापार और नौवहन की लंबी परंपरा रही है। सिंधु घाटी सभ्यता के लोथल जैसे स्थलों से प्राचीन समुद्री व्यापार की विकसित समझ के संकेत मिलते हैं। भारतीय व्यापारी और नाविक हिंद महासागर के विभिन्न हिस्सों में व्यापार तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम बने। पूर्वी तट पर कलिंग की समुद्री परंपरा, दक्षिण भारत के चोलों की समुद्री गतिविधियां और पश्चिमी तट के बंदरगाहों से होने वाला व्यापार भारत के समुद्री इतिहास की विविधता को दर्शाता है। समुद्र भारत के लिए केवल व्यापार का मार्ग नहीं था, बल्कि विचारों, भाषाओं, धर्मों, कला और संस्कृति के प्रसार का माध्यम भी रहा है। यह ऐतिहासिक विरासत आज भारत के आधुनिक समुद्री विकास के लिए प्रेरणा का आधार बन सकती है। समुद्री विकास को केवल आर्थिक दृष्टि से देखने के बजाय यदि उसे इतिहास, संस्कृति, पर्यावरण और तटीय समाजों के साथ जोड़ा जाए तो भारत की समुद्री पहचान और अधिक व्यापक रूप में सामने आती है।

भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था और सागरमाला

भारत की भौगोलिक स्थिति उसे हिंद महासागर क्षेत्र में विशेष महत्व देती है। लगभग 11,099 किलोमीटर लंबी तटरेखा और करीब 14,500 किलोमीटर संभावित नौगम्य जलमार्ग देश के समुद्री एवं अंतर्देशीय परिवहन की महत्वपूर्ण आधारभूमि हैं। भारत सरकार का सागरमाला कार्यक्रम बंदरगाह आधारित विकास, बेहतर संपर्कता, तटीय समुदायों के विकास तथा तटीय पोत परिवहन और अंतर्देशीय जलमार्गों को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। समुद्री अवसंरचना का विस्तार व्यापार को गति देने के साथ लॉजिस्टिक लागत घटाने, उद्योगों को बाजार से जोड़ने, निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और तटीय क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करने में सहायक हो सकता है। मार्च 2026 तक उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सागरमाला के तहत 315 परियोजनाएं पूरी हो चुकी थीं और 210 परियोजनाएं क्रियान्वयन अधीन थीं। समुद्री विकास में तटीय समुदायों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है। मछुआरे, नाविक, बंदरगाह श्रमिक, छोटे व्यापारी और पर्यटन क्षेत्र से जुड़े लोग इसके प्रत्यक्ष भागीदार हैं। इसलिए सफलता का आकलन केवल कार्गो क्षमता से नहीं, बल्कि स्थानीय आय, कौशल, रोजगार और जीवन-स्तर में सुधार से भी किया जाना चाहिए।

ब्लू इकोनॉमी : समुद्र से समृद्धि की नई अवधारणा

समुद्र के संसाधनों का टिकाऊ आर्थिक उपयोग आज ब्लू इकोनॉमी की अवधारणा के रूप में सामने आया है। इसका उद्देश्य समुद्री संसाधनों से आर्थिक विकास, रोजगार और आजीविका के अवसर पैदा करना है, लेकिन ऐसा करते समय समुद्री पारिस्थितिकी की क्षमता और सीमाओं का सम्मान करना भी आवश्यक है। मत्स्य पालन, समुद्री पर्यटन, जहाज निर्माण, समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी, अपतटीय ऊर्जा, समुद्री परिवहन और बंदरगाह आधारित उद्योग ब्लू इकोनॉमी के प्रमुख क्षेत्र हो सकते हैं। भारत ने भी समुद्री अनुसंधान, बंदरगाह विकास, मत्स्य क्षेत्र और गहरे समुद्र से संबंधित तकनीकी क्षमता को बढ़ाने के लिए विभिन्न पहल की हैं। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अनुसार डीप ओशन मिशन का उद्देश्य गहरे समुद्र में अनुसंधान और प्रौद्योगिकी विकास के साथ समुद्री संसाधनों के टिकाऊ उपयोग की दिशा में क्षमता विकसित करना है। लेकिन ब्लू इकोनॉमी का अर्थ समुद्र से अधिकाधिक संसाधन निकालना नहीं है। यदि आर्थिक गतिविधियां समुद्री पारिस्थितिकी की पुनरुत्पादन क्षमता से आगे निकल जाती हैं तो अल्पकालिक लाभ दीर्घकालिक नुकसान में बदल सकता है। इसलिए समुद्री विकास का मूल सिद्धांत होना चाहिए समुद्र से समृद्धि, समुद्र की कीमत पर नहीं।

समुद्री जैव विविधता : जीवन की अनमोल संपदा

समुद्र की गहराइयों में जीवन का संसार अत्यंत विशाल और विविध है। प्रवाल भित्तियां, मैंग्रोव, समुद्री घास, शैवाल, मछलियां, कछुए, डॉल्फिन, व्हेल और असंख्य सूक्ष्म जीव समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं। इनमें से कई प्रजातियां मानव आंखों से दिखाई भी नहीं देतीं, लेकिन समुद्री खाद्य शृंखला और पारिस्थितिक संतुलन में उनका महत्व अत्यंत बड़ा है। मैंग्रोव और समुद्री घास जैसे तटीय पारिस्थितिकी तंत्र कार्बन को अवशोषित करने, तटों को प्राकृतिक सुरक्षा देने और अनेक जीवों को प्रजनन एवं आश्रय स्थल उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार समुद्र जलवायु को नियंत्रित करने और पृथ्वी की जैव विविधता को बनाए रखने में केंद्रीय भूमिका निभाता है। समुद्री जैव विविधता का संरक्षण केवल पर्यावरणीय दायित्व नहीं, बल्कि खाद्य और आर्थिक सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ विषय है। समुद्री जीवों की संख्या और विविधता में गिरावट का असर मत्स्य संसाधनों, तटीय रोजगार और खाद्य आपूर्ति पर पड़ सकता है।

जलवायु परिवर्तन का बढ़ता प्रभाव

समुद्र जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का एक महत्वपूर्ण संकेतक भी है और उसके प्रभावों का बड़ा वाहक भी। बढ़ते तापमान से समुद्री जल का तापमान बढ़ रहा है, समुद्री पारिस्थितिकी प्रभावित हो रही है और कई तटीय क्षेत्रों के सामने समुद्र-स्तर बढ़ने का खतरा है। समुद्री हीटवेव, महासागरीय अम्लीकरण और चरम मौसम की घटनाएं समुद्री जीवन तथा तटीय समाजों के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं। दूसरी ओर समुद्र स्वयं जलवायु प्रणाली का महत्वपूर्ण नियामक है। वह बड़ी मात्रा में ऊष्मा और कार्बन को अवशोषित करता है। यही कारण है कि समुद्र की स्थिति में होने वाला परिवर्तन वैश्विक जलवायु व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। समुद्र और जलवायु को अलग-अलग विषय मानकर नीतियां बनाना इसलिए प्रभावी नहीं हो सकता। भारत जैसे बड़े तटीय देश के लिए जलवायु परिवर्तन का प्रश्न विशेष महत्व रखता है। तटीय शहरों, द्वीपीय क्षेत्रों, मछुआरा समुदायों और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों को ध्यान में रखते हुए अनुकूलन और आपदा-रोधी अवसंरचना को मजबूत करना आवश्यक है।

समुद्री प्रदूषण : आधुनिक विकास की बड़ी चुनौती

समुद्र में पहुंचने वाला प्लास्टिक कचरा आज सबसे अधिक दिखाई देने वाली पर्यावरणीय समस्याओं में से एक है। लेकिन समुद्री प्रदूषण केवल प्लास्टिक तक सीमित नहीं है। तेल रिसाव, औद्योगिक अपशिष्ट, अनुपचारित सीवेज, रासायनिक पदार्थ और नदियों के माध्यम से समुद्र तक पहुंचने वाला कचरा भी समुद्री पारिस्थितिकी को प्रभावित करता है। माइक्रोप्लास्टिक इस समस्या को और जटिल बनाता है। प्लास्टिक के छोटे कण समुद्री जीवों के शरीर में पहुंच सकते हैं और खाद्य शृंखला का हिस्सा बन सकते हैं। इसका असर केवल समुद्री जीवों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अंततः मानव खाद्य तंत्र और स्वास्थ्य से भी जुड़ सकता है। समुद्र की सफाई के लिए केवल समुद्र तटों से कचरा उठाना पर्याप्त नहीं है। कचरे के स्रोत पर नियंत्रण, बेहतर अपशिष्ट प्रबंधन, नदियों में प्रदूषण की रोकथाम, प्लास्टिक के जिम्मेदार उपयोग और उद्योगों के पर्यावरणीय अनुपालन को समान महत्व देना होगा। समुद्र को स्वच्छ रखने की शुरुआत वास्तव में भूमि से होती है।

टिकाऊ मत्स्य पालन और तटीय समुदाय

समुद्र करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है। मछुआरा समुदाय समुद्री संसाधनों का प्रत्यक्ष उपयोग करने वाला सबसे महत्वपूर्ण समूह है। लेकिन अत्यधिक मत्स्य दोहन, समुद्री प्रदूषण, बदलती जलवायु और तटीय पारिस्थितिकी में बदलाव उनके सामने नई चुनौतियां पैदा कर रहे हैं। टिकाऊ मत्स्य पालन के लिए वैज्ञानिक आकलन, प्रजातियों के संरक्षण, प्रजनन काल में उचित प्रतिबंध और छोटे मछुआरों के हितों का संरक्षण आवश्यक है। साथ ही आधुनिक मौसम सूचना, समुद्री चेतावनी प्रणालियों और सुरक्षित नौकाओं तक पहुंच बढ़ाना भी महत्वपूर्ण है। तटीय विकास योजनाओं में स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित किए बिना दीर्घकालिक सफलता कठिन होगी। समुद्र से जुड़े पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर अधिक प्रभावी और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल समाधान विकसित किए जा सकते हैं।

समुद्री श्रमिक : वैश्विक व्यापार के अदृश्य आधार

जहाज और बंदरगाह समुद्री अर्थव्यवस्था के दिखाई देने वाले हिस्से हैं, लेकिन उनके पीछे काम करने वाले नाविक और अन्य समुद्री श्रमिक इस व्यवस्था की वास्तविक मानवीय शक्ति हैं। वे लंबे समय तक परिवार से दूर रहकर कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं और कई बार जोखिमपूर्ण समुद्री क्षेत्रों से होकर गुजरते हैं। 2026 में IMO ने नाविकों की भूमिका और जोखिमों को अलग से रेखांकित किया है। संगठन के अनुसार समुद्री श्रमिक वैश्विक व्यापार को गतिशील बनाए रखते हैं, लेकिन संघर्ष और असुरक्षा वाले क्षेत्रों में उनके सामने अतिरिक्त जोखिम उत्पन्न होते हैं। समुद्री क्षेत्र के भविष्य के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। स्वचालन, डिजिटल तकनीक, नए ईंधन और ऊर्जा संक्रमण के कारण नाविकों के कौशल में भी बदलाव जरूरी है। IMO ने 2026 में STCW व्यवस्था को नई तकनीकों, नए ईंधनों और बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप अद्यतन करने की प्रक्रिया पर जोर दिया है।

तकनीक और समुद्री क्षेत्र का भविष्य

डिजिटल तकनीक समुद्री परिवहन को तेजी से बदल रही है। स्मार्ट पोर्ट, स्वचालित प्रणालियां, उपग्रह आधारित निगरानी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा विश्लेषण और आधुनिक नेविगेशन प्रणालियां समुद्री क्षेत्र की दक्षता और सुरक्षा को नई दिशा दे रही हैं। भारत में भी समुद्री क्षेत्र में नवाचार और स्टार्टअप को बढ़ावा देने की पहल की जा रही है। सागरमाला स्टार्टअप एवं इनोवेशन इनिशिएटिव के तहत समुद्री तकनीक के विकास और परीक्षण के लिए विभिन्न संस्थानों में मैरीटाइम इनोवेशन हब स्थापित किए गए हैं। लेकिन तकनीक का विस्तार साइबर सुरक्षा और मानव कौशल की नई चुनौतियां भी सामने लाता है। अत्यधिक डिजिटल निर्भरता के दौर में साइबर हमलों से बंदरगाहों और जहाजों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी भौतिक सुरक्षा। भविष्य के समुद्री तंत्र में तकनीक और मानवीय दक्षता को साथ लेकर चलना होगा।

समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग

समुद्री मार्ग किसी एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं होते। अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए जहाजों को अनेक देशों के समुद्री क्षेत्रों और वैश्विक समुद्री मार्गों से गुजरना पड़ता है। इसलिए समुद्री सुरक्षा का स्वरूप स्वाभाविक रूप से अंतरराष्ट्रीय है। समुद्री डकैती, तस्करी, अवैध मछली पकड़ना, साइबर खतरे और भू-राजनीतिक तनाव समुद्री परिवहन की सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं। हाल के वर्षों में विभिन्न समुद्री क्षेत्रों में संघर्ष और तनाव ने यह भी दिखाया है कि समुद्री सुरक्षा का सीधा संबंध वैश्विक आपूर्ति शृंखला से है। इसलिए समुद्री कानून, नौवहन की स्वतंत्रता, सूचना साझेदारी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का महत्व बढ़ गया है। विश्व समुद्री दिवस की 2026 की थीम भी इसी व्यापक दृष्टिकोण को मजबूत करती है। अंतरराष्ट्रीय नियम तभी प्रभावी होंगे जब उन्हें समान रूप से लागू किया जाए। IMO ने सुरक्षित, कुशल और पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ जहाजरानी के लिए वैश्विक नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन को प्राथमिकता दी है।

विकास और संरक्षण के बीच संतुलन

समुद्री क्षेत्र में विकास की संभावनाएं बहुत बड़ी हैं, लेकिन विकास की गति यदि पर्यावरणीय क्षमता से आगे निकल जाए तो उसका परिणाम समुद्र और तटीय समाजों दोनों के लिए गंभीर हो सकता है। नए बंदरगाह, औद्योगिक गलियारे, तटीय पर्यटन, ऊर्जा परियोजनाएं और शहरी विस्तार आवश्यक हो सकते हैं, लेकिन इनके लिए वैज्ञानिक योजना और पर्यावरणीय प्रभावों का समुचित आकलन भी जरूरी है। इसलिए अब समुद्री विकास का दृष्टिकोण ‘कितना अधिक उपयोग’ से बदलकर ‘कितना टिकाऊ उपयोग’ होना चाहिए। आर्थिक गतिविधियों के साथ समुद्री संरक्षित क्षेत्रों, मैंग्रोव, प्रवाल भित्तियों और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा को भी योजना का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा। भारत में सागरमाला जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से बंदरगाह, संपर्कता, तटीय समुदाय और जलमार्गों को विकास के साथ जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। आगे की चुनौती यह होगी कि समुद्री अवसंरचना के विस्तार को पर्यावरणीय स्थिरता और स्थानीय आजीविका के साथ किस तरह संतुलित किया जाए।

समुद्र संरक्षण में नागरिकों की भूमिका

समुद्र की रक्षा केवल सरकारों, वैज्ञानिकों और समुद्री उद्योग की जिम्मेदारी नहीं है। आम नागरिक भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। प्लास्टिक का कम उपयोग, कचरे का उचित निस्तारण, समुद्र तटों की स्वच्छता, जिम्मेदार पर्यटन और समुद्री जीवों के प्रति संवेदनशील व्यवहार जैसे छोटे कदम व्यापक परिवर्तन का आधार बन सकते हैं। स्कूलों और विश्वविद्यालयों में समुद्री पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाना भी आवश्यक है। समुद्र से दूर रहने वाले लोगों के लिए समुद्र अक्सर एक दूरस्थ प्राकृतिक संसाधन जैसा दिखाई देता है, जबकि उनके भोजन, ऊर्जा, व्यापार और जलवायु से उसका सीधा संबंध होता है। इस ‘समुद्री दूरी’ को कम करना समय की आवश्यकता है।

वैश्विक विकास के साथ समुद्री पर्यावरण संरक्षण भी जरूरी

विश्व समुद्री दिवस हमें याद दिलाता है कि समुद्र केवल नीला विस्तार नहीं, बल्कि पृथ्वी के जीवन-तंत्र की आधारभूत कड़ी है। वह वैश्विक व्यापार को गति देता है, करोड़ों लोगों को रोजगार और भोजन उपलब्ध कराता है, जलवायु को प्रभावित करता है और असंख्य जीवों का घर है। इसलिए समुद्र की सुरक्षा मानव सभ्यता के भविष्य से जुड़ी है। वर्ष 2026 की “From Policy to Practice: Powering Maritime Excellence” थीम समुद्री क्षेत्र में नीति और प्रभावी क्रियान्वयन के बीच की दूरी समाप्त करने पर जोर देती है। अंतरराष्ट्रीय नियम तभी सार्थक होंगे, जब उनका प्रभाव जहाजों की सुरक्षा, बंदरगाहों की दक्षता, समुद्री श्रमिकों के अधिकार, प्रदूषण नियंत्रण और पर्यावरण संरक्षण में दिखाई दे। भारत के लिए समुद्री क्षेत्र आर्थिक विकास, रोजगार, व्यापार, ऊर्जा और सुरक्षा के साथ सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। विशाल तटरेखा, हिंद महासागर में स्थिति, बंदरगाहों और जलमार्गों का विस्तार तथा ब्लू इकोनॉमी की संभावनाएं नए अवसर प्रस्तुत करती हैं। इनका लाभ तभी टिकाऊ होगा, जब समुद्र को केवल संसाधन नहीं, साझा प्राकृतिक विरासत माना जाए। भविष्य की समुद्री नीति का लक्ष्य सुरक्षित समुद्र, स्वच्छ पर्यावरण, स्वस्थ पारिस्थितिकी और सम्मानजनक रोजगार सुनिश्चित करना होना चाहिए। समुद्र की रक्षा पूरी मानवता की साझा जिम्मेदारी है।

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