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Vvan Review: ये कौन सा बिहार दिखा रहे हैं Arunabh? छठ को समझा नहीं, बस बेचने की कोशिश कर दी


मनोरंजन 28 September 2026
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Vvan Review: ये कौन सा बिहार दिखा रहे हैं Arunabh? छठ को समझा नहीं, बस बेचने की कोशिश कर दी

छठ बिहार के लिए सिर्फ त्योहार नहीं, आस्था और अस्मिता है. लेकिन Vvan में इसे जिस सतही तरीके से पेश किया गया, उसे देखकर सवाल उठता है- आखिर Arunabh Kumar और Deepak Mishra कौन सा बिहार दिखा रहे हैं?

मैं बिहारी हूं. इसलिए Vvan से मेरी उम्मीद शायद बाकी दर्शकों से थोड़ी ज्यादा थी. फिल्म से पहले जब Arunabh Kumar और Deepak Mishra का नाम सामने आया, तो लगा कि चलिए, इस बार बिहार को किसी फिल्मी stereotype की नजर से नहीं, बल्कि उस जमीन की अपनी नजर से देखा जाएगा. TVF के शो जिस rawness और organic storytelling के लिए पहचाने जाते रहे हैं, उसी भरोसे पर उम्मीद बंधी थी.

ऊपर से कहानी में छठ, वन देवी और बिहार की लोक आस्था का रंग था. यानी सामग्री पूरी थी कि कुछ ऐसा बने, जिसे देखकर बिहार का दर्शक कहे- हां, ये हमारा बिहार है.

लेकिन फिल्म देखने के बाद सबसे पहला सवाल यही निकलता है- ये कौन सा बिहार दिखा रहे हैं?

छठ को समझा नहीं, बस कैमरे में उतार दिया

Vvan की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि इसकी कहानी कमजोर है. समस्या यह है कि फिल्म जिस चीज को अपनी आत्मा बनाने का दावा करती है, उसे ही ठीक से समझ नहीं पाती.

छठ बिहार के लिए कोई सुंदर cinematic backdrop नहीं है. यह घर-परिवार, व्रत, लोकविश्वास, अनुशासन, परंपरा और भावनाओं से जुड़ा महापर्व है. बिहार से बाहर रहने वाला बिहारी भी छठ पर अपनी मिट्टी की तरफ लौटता है.

लेकिन फिल्म में ऐसा लगता है जैसे घाट, पूजा, लोक आस्था और कुछ प्रतीकों को एक साथ रख देने से उस भावना को स्क्रीन पर उतार दिया जाएगा.

नहीं.

छठ को दिखाना और छठ को महसूस करना दो बिल्कुल अलग बातें हैं.

फिल्म में छठ नजर आता है, लेकिन उसकी आत्मा महसूस नहीं होती.

ये बिहार नहीं, फिल्म सिटी का बिहारी सेट है

Vvan का बिहार देखकर कई बार ऐसा लगता है जैसे फिल्म सिटी में किसी डेली सोप का सेट लगाया गया हो और उसमें कुछ बिहारी रंग भर दिए गए हों.

बिहार सिर्फ साड़ी, घाट, देसी संवाद और कुछ खास चेहरों का नाम नहीं है.

बिहार की अपनी भाषा है, अपनी body language है, अपने घरों की बनावट है, अपने रिश्तों का तरीका है, अपनी सामाजिक परतें हैं.

इन छोटी-छोटी चीजों से जगह असली लगती है.

Vvan में यही authenticity सबसे ज्यादा गायब है.

फिल्म को देखकर लगता है कि बिहार को दिखाने की तैयारी ज्यादा की गई, बिहार को समझने की मेहनत कम.

और एक बिहारी दर्शक इस फर्क को तुरंत पकड़ लेता है.

Arunabh, आखिर कौन सा बिहार दिखा रहे हैं?

Arunabh Kumar के नाम ने इसलिए उम्मीद जगाई थी क्योंकि TVF की पहचान ही उन कहानियों से बनी, जिनमें छोटे शहर और आम लोग किसी caricature की तरह नहीं बल्कि अपनी पूरी जटिलता के साथ दिखाई देते हैं.

इसलिए Vvan में बिहार देखकर निराशा और ज्यादा होती है.

यहां बिहार कई जगह एक backdrop बनकर रह जाता है.

किरदारों के पीछे बिहार है, लेकिन किरदारों के भीतर बिहार कम दिखाई देता है.

यही वजह है कि फिल्म देखते हुए बार-बार लगता है- आखिर यह किस अनुभव से निकला हुआ बिहार है?

बिहारी दर्शक को सिर्फ stereotype मत दीजिए

सिनेमा ने बिहार को लंबे समय तक कुछ तय clichés में बांध रखा है. गरीब, गंवार, दबंग, देसी, अंधविश्वासी, मजाकिया बिहारी.

समस्या यह है कि Vvan इन stereotypes से बाहर निकलने के बजाय कई जगह उन्हें नए packaging में पेश करती हुई लगती है.

बिहारी दर्शक इतना भी भोला नहीं है कि उसे सिर्फ कुछ दृश्य दिखाकर भरोसा दिला दिया जाए कि आपने बिहार समझ लिया.

हम जानते हैं कि हमारी संस्कृति कैसी है.

हम जानते हैं कि हमारी आस्था का वजन क्या है.

हम जानते हैं कि हमारे त्योहार सिर्फ camera-friendly visuals नहीं हैं.

छठ कोई production design नहीं है

और शायद यही बात फिल्म बनाने वालों को सबसे ज्यादा समझने की जरूरत थी.

छठ को कहानी में शामिल करना बहुत आसान है.

सूर्य को अर्घ्य का खूबसूरत shot लीजिए. घाट सजाइए. लोकगीत बजाइए. साड़ी और प्रसाद दिखाइए. कैमरा slow कर दीजिए.

लेकिन इससे छठ नहीं बनता.

छठ उस मां की आंखों में होता है जो व्रत रखती है.

उस परिवार की चिंता में होता है जो घाट तक साथ चलता है.

उस व्यक्ति की बेचैनी में होता है जो हजारों किलोमीटर दूर से सिर्फ इस पर्व के लिए घर लौटता है.

उस लोकविश्वास में होता है जो पीढ़ियों से आगे बढ़ता आया है.

Vvan इन भावनाओं की गहराई तक पहुंचने के बजाय उनके visual surface पर ज्यादा अटक जाती है.

वन देवी भी असर नहीं छोड़ पातीं

फिल्म की वन देवी से जुड़ी लोककथा को जिस रहस्य और वजन के साथ पेश किया जाना चाहिए था, वहां भी फिल्म लड़खड़ाती है.

Voice-over कई जगह इतना artificial महसूस होता है कि रहस्य पैदा होने से पहले ही scene का असर टूट जाता है.

एक पल के लिए तो यह सवाल भी आता है कि क्या इस काम के लिए इंडस्ट्री में कोई बेहतर voice artist नहीं मिला?

जिस आवाज को सदियों पुरानी मान्यता, डर और श्रद्धा का एहसास कराना था, वह कई जगह सिर्फ narration जैसी लगती है.

लोकविश्वास को screen पर उतारना सिर्फ dialogue लिख देने का काम नहीं है. उसके लिए उस विश्वास की भाषा और उसकी धड़कन समझनी पड़ती है.

Vvan यहां भी अधूरी रह जाती है.

और फिर ‘हिंदी की Kantara’!

फिल्म को 'हिंदी की Kantara' कहे जाने की चर्चा ने उम्मीदें और बढ़ा दी थीं.

लेकिन Kantara से तुलना करने से पहले एक सवाल पूछना चाहिए- क्या हमने उस जमीन को उतनी ही ईमानदारी से समझा है?

Kantara की ताकत सिर्फ folklore नहीं था. उसकी ताकत उसकी मिट्टी और उस मिट्टी में मौजूद विश्वास के साथ उसका रिश्ता था.

Vvan में folklore तो है, लेकिन वह रिश्ता कमजोर है.

इसलिए तुलना सुनकर सवाल उठता है- confidence ठीक है, लेकिन overconfidence क्यों?

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एडिट टेबल पर फिल्म देखी होगी आपने

फिल्म बनाने वाले अपनी फिल्म को सबसे पहले देखते हैं.

एडिट टेबल पर scenes जुड़ते हैं, कहानी का rhythm सामने आता है, कमजोरियां दिखाई देती हैं और फिर फैसला होता है कि क्या रखना है और क्या हटाना है.

तो फिर Vvan को देखकर यह सवाल और बड़ा हो जाता है कि क्या किसी ने यह नहीं देखा कि फिल्म जिस बिहार को दिखा रही है, वह कितना सतही महसूस हो रहा है?

क्या किसी ने नहीं सोचा कि छठ को कहानी में जिस तरह इस्तेमाल किया गया है, उससे बिहार का दर्शक जुड़ पाएगा या नहीं?

या फिर यह मान लिया गया कि छठ दिखा दिया, बिहार दिख गया?

बिहार को दिखाना और बिहार को समझना अलग है

Vvan देखने के बाद मेरे लिए सबसे निराशाजनक बात यही है.

फिल्म में बिहार दिखाने की कोशिश साफ दिखाई देती है.

लेकिन बिहार को समझने की कोशिश उतनी साफ दिखाई नहीं देती.

और यही अंतर किसी भी regional culture पर फिल्म बनाते समय सबसे महत्वपूर्ण होता है.

एक बिहारी दर्शक अपने शहर, अपने गांव, अपने त्योहार और अपनी आस्था को स्क्रीन पर सिर्फ इसलिए स्वीकार नहीं कर लेता क्योंकि कैमरा उसे खूबसूरती से शूट कर रहा है.

वह पूछता है- यह मेरा अनुभव है भी या नहीं?

Vvan इस सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं दे पाती.

एक बिहारी होने के नाते यह फिल्म क्यों चुभती है

मुझे फिल्म खराब लगी, यह कहना आसान है.

लेकिन मेरी नाराजगी सिर्फ खराब सिनेमा को लेकर नहीं है.

मेरी नाराजगी इसलिए है क्योंकि यहां एक ऐसी संस्कृति और आस्था को छूने की कोशिश की गई, जिसकी गहराई समझे बिना उसका इस्तेमाल कर लिया गया.

हम पहले से बिहार की image की लड़ाई लड़ रहे हैं.

हम चाहते हैं कि बिहार को सिर्फ jokes, stereotypes और गरीबी के फ्रेम में न देखा जाए.

ऐसे में जब कोई बड़ी फिल्म छठ और बिहार की लोक आस्था को अपनी कहानी का केंद्र बनाती है, तो उम्मीद होती है कि शायद इस बार कुछ अलग दिखेगा.

लेकिन Vvan ने उस उम्मीद पर पानी फेर दिया.

एक बिहारी के लिए छठ कोई content hook नहीं है. यह हमारी पहचान का हिस्सा है.

आप commercial film बनाइए. पैसा कमाइए. मनोरंजन कीजिए.

लेकिन जब हमारी आस्था को अपनी कहानी की ताकत बना रहे हैं, तो कम से कम उसे समझने की जिम्मेदारी तो निभाइए.

क्योंकि बिहार को costume बनाकर बिहार नहीं दिखाया जा सकता.

घाट दिखा देने से बिहार नहीं बनता.

छठ दिखा देने से उसकी आस्था नहीं आ जाती.

और कुछ लोककथाएं जोड़ देने से 'Kantara' नहीं बनती.

Vvan देखने के बाद मेरे पास फिल्म के लिए कोई मीठा verdict नहीं है.

 

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